शिक्षा की अन्य किसी भी शाखा में देश की जनता को इतनी अधिक लम्बी अवधि तक लगातार ठगा नहीं गया है जितना भारतीय इतिहास की विद्या में ।

ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करने वाले विद्यार्थियों और पर्यटकों को ईन स्थानो के इतिहास के नाम पर मनगढ़न्त जानकारियां दी जा रही है।उदाहरण के लिए, दिल्ली में कुतुबमीनार के नाम से पुकारे जाने वाले २३८ फुट ऊँचे स्तम्भ का मामला लीजिए । इसके मुलोद्गम के बारे में सभी तथाकथित इतिहास-लेखक और सामान्य जनता समान रूप में अनिश्चित हैं, फिर भी जनता के सम्मुख जो इतिहास प्रस्तुत किए जाते हैं उनमें नितान्त झूठी बातों को सत्य-कथन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ।

कुछ लोगों का कहना है कि इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया गया था, जो दिल्ली पर सन् १२०६ ई० से १२१० ई० तक राज्य करने वाला शासक था।  अन्य लोग कहते हैं कि इसे ऐबक के दामाद और उत्तराधिकारी अल्तमश ने बनवाया था। अन्य विचार यह है कि अलाउद्दीन खिलजी ने इसे अथवा कम-से-कम इसके कुछ भाग को तो अवश्य ही बनवाया था। चौथा मत यह है कि फ़िरोजशाह तुगलक ने इस स्तम्भ को अथवा इसके कुछ भाग को बनवाया होगा। पाँचवां मत यह भी है कि उपर्युक्त चार शासकों में से एक ने अथवा एक से अधिक शासकों ने अकेले अथवा संयुक्त रूप से इस स्तम्भ का निर्माण कराया होगा। सबसे आश्चर्यकारी तथ्य यह है कि कोई भी इतिहास-प्रन्थ निष्ठापूर्वक, सत्यता से समस्त मामला स्पष्ट नहीं करेगा और  साफ़-साफ़ शब्दों में यह नहीं कहेगा कि कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन अथवा इल्तमश अथवा अलाउद्दीन अथवा फ़िरोजशाह अथवा इनमें से दो अथवा अधिक ने बनवाया था क्योंकि ऊपर जिन चारों मुस्लिम बादशाहों के नाम इस मीनार के निर्माण-श्रेय दिया है, उनमें  से किसी ने भी लिखित दावा नहीं किया है।,

प्रत्येक इतिहास में सरलतापूर्वक यही कहा जाएगा कि कुतुबमीनारको कुतुबुद्दीन अथवा इल्तमश अथवा अलाउद्दीन या फ़िरोज़शाह अथवा इनमें से दो अथवा अधिक ने बनवाया था। तथाकथित सभी इतिहास-लेखक जानते हैं कि उन के कथन झूठे और निराधार हैं, क्योंकि उनमें से किसी भी बादशाह ने स्वयं यह दावा नहीं किया है कि उसने यह स्तम्भ बनवाया था।

इस प्रकार के मामले में सभी इतिहास-लेखक का यह कर्तव्य है कि वह जनता को सभी पाँचों विचार बता दे और साथ में यह भी कह दे कि इन विचारों के लिए कोई भी प्रमाण, उपलब्ध नहीं है। फिर भी, ऐसे तथाकथित इतिहास-लेखकों में से किसी एक ने भी ऐसा काम नहीं किया है। इतिहास-लेखकों को स्पष्टतः इस कुतुबमीनारी-कथा में विद्यमान विसंगतियों का ज्ञान है क्योंकि अखिल भारतीय इतिहास संगठन के वार्षिक समारोह  मे सब असंगतियो से सम्बन्धित शोध-पत्र पढ़ चुके हैं।

जब इतिहास-लेखकों को इस बात की जानकारी है कि कुतुबमीनार का मूलोद्गम विवाद का विषय है, और उपर्यक्त पाँच मतों में से एक के लिए भी कोई ठोस आधार विद्यमान नहीं है, तब क्या उनका कर्तव्य नहीं है कि वे किसी भी निर्णायक मत की घोषणा करने से संकोच करें ? क्या यह भी उनका कर्तव्य नहीं है कि वे सभी तथ्य जनता के समक्ष प्रस्तुत कर दें, और फिर वे यदि स्वयं भी इच्छुक हों, तो किसी भी विशेष मत के बारे में अपनी रुचि का उल्लेख भी कर दें। किन्तु वे जब इतने महत्वपूर्ण तथ्यों को जनता से छुपाते हैं, जब इतनी आवश्यक जानकारी को जनता के सम्मुख प्रकट नहीं होने देते, तब क्या अपने पावन कर्तव्यपालन की अवहेलना करने के लिए ऐसे तथाकथित इतिहास लेखकों को सार्वजनिक रूप में दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिये ? जबकि जनता इतिहास-लेखकों को उनके भारी-भारी वेतन देती  है, उनकी पुस्तकों के मूल्य चुकाती है,, तब क्या जनता को यह आशा नहीं करनी चाहिये कि ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारी उनसे छुपाकर नहीं रखी जाएगी?

इस बात पर यह विचार किया जा सकता है कि सभी विकल्पों का उल्लेख करना असम्भाव्य होगा क्योंकि उससे प्रत्येक विषय बहुत लम्बा हो जाएगा। यह सत्यता नहीं है। मैं ऊपर प्रदर्शित कर चुका हूँ कि किस भी प्रकार उपर्युक्त सभी पाँचों मतों को दो या तीन छोटे वाक्यों में, सम्पूक्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।

 जनता के सम्मुख सभी तथ्यों का रखा जाना अत्यधिक महत्त्व की बात है। कल्पना करें कि किसी व्यक्ति ने सातवीं कक्षा  तक पढ़ने के बाद शैक्षिक अध्ययन समाप्त कर दिया है। उसकी  पुस्तक में कुतुबमीनार पर एक पाठ भी था । यदि उस पाठ के लेखक ने व्याजोक्तिपूर्ण स्वर में कह दिया है कि यह स्तम्भ कुतुबुद्दीन द्वारा ही बनाया गया था, तो वह विद्यार्थी अपने मन में आजीवन यही छाप बनाए रहेगा कि कुतुबुद्दीन ही उस मीनार का निर्माता था। वह यह भी नहीं जानेगा कि उसके विचार के लिए कोई भी आधार नहीं था। बाद में, यदि मेरे जैसा कोई अन्वेषक उस विचार पर विवाद करे, तो वह व्यक्ति इसे अव्यवहार्य मान कर अवहेलना कर देगा और ऐसा करते हुए वह यह भी तकलीफ़ नहीं करेगा कि मैं अपने विचार के समर्थन में जो तर्क और साक्ष्य दे रहा हूँ, उन्हें तो कम-से-कम एक बार पढ़ लिया जाय । इस प्रकार के आधारहीन कथनों से दूसरा भयंकर खतरा यह है कि यह उन गुंजायशों को समाप्त कर देता है जो अन्वेषण के लिए मुक्त होनी चाहिये थी। इस प्रकार, उदाहरण के लिए, यदि सातवीं कक्षा से स्नातकोत्तर स्तर तक कुतुबमीनार के सम्बन्ध में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी बारम्बार उन पाँचों मतों को इस पद-टीप के साथ पढ़ते हैं कि वे पाँचों मत केवल अनुमान ही हैं, तो अनेक जिज्ञासु व्यक्ति कुतुबमीनार वास्तविक मूलोद्गम का पता लगाने के लिए तत्पर हो जाएँगे। अनेक लोग इसके इतिहास को संग्रह करने में अथवा अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में लाने में सफल हो सकेंगे । किन्तु कुतुबमीनार के सम्बन्ध में सभी ऐतिहासिक पुस्तकों में आधारहीन कथन इतिहास के बारे मे अन्वेषण करने से प्रतिभावान अन्वेषकों को रोकते हैं । उन सब को यह समझा दिया जाता है कि कुतुबमीनार का मूल तो असंदिग्ध रूप में सिद्ध किया जा चुका है, और अब उसमें किसी भी प्रकार का शोधकार्य आवश्यक नहीं है। यह घोर शैक्षिक क्षति है जिसका उत्तर इतिहास-लेखकों से अवश्य ही लेना चाहिये।

किन्तु यही सब कुछ नहीं है ।  कुतुबमीनार के बारे में जो कहा गया है, वह तो एक उदाहरण मात्र है। यही बात उन सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक नगरियों, मस्जिदों, मकबरों, किलों, अन्य आवसीय भवनों, पूलों, नहरों और तालाबों के बारे में भी लागू होती है जिनका निर्माण-श्रेय मूस्लिम शासकों को दिया जाता है।

ताजमहल का ही उदाहरण लें। इसके निर्माण की लागत ४० लाख से  करोड़ रुपये तक और इसकी निर्माणावधि १० वर्ष से २२ वर्ष के बीच आंकी जाती है। ईसा अफन्दी से अहमद महन्दीस, आस्टिन द-बरोरड्योक्स, जीरोनीमो वीरोनिओ अथवा बुरी तरह अश्रु बहाते हुए स्वयं शाहजहाँ में से कोई भी व्यक्ति इसका रूप रेखांकर हो सकता है। इस प्रकार की घोर अनिश्चितता ताजमहल के प्रत्येक विवरण की विशिष्टता है, जिसमें मुमताज़ की मृत्यु और उसको दफ़नाने की तारीखें भी सम्मिलित हैं ।

और फिर भी जैसा कुतुब मीनार के मामले में है, वैसा ही ताजमहल के बारे में भी इतिहास ने व्यावहारिक रूप से सभी तथ्य देते हुए यह एक पद-टीप जोड़ दिया है कि सभी समान रूप में निराधार और काल्पनिक हैं। भारत सरकार के पर्यटन और पुरातस्व विभागों के प्रकाशकों सहित सभी इतिहास-पुस्तकें एक ही विनम्र और निराधार मत प्रस्तुत करती हैं तथा यह घोषित करती हैं कि ताजमहल के सम्बन्ध में वही अन्तिम शब्द है । इसका दुष्परिणाम इतना भयावह है कि प्रत्येक व्यक्ति इसी धारणा को हृदर्यगम किये रहता है कि ताजमहल के बारे में कोई भी अनिश्चितता नहीं है।

यथार्थ रूप में तो यही बात भारत के प्रत्येक मध्यकालीन ऐतिहासिक मकबरे, मस्जिद, किले और नगरी के बारे में घटित हो रही है। उनके मूल के सम्बन्ध में अनाप-शनाप कहानियों कहकर जनता को बुद्धू बनाया जा रहा है । मज़ा यह है कि ये सभी कहानियाँ एक-दूसरे से पर्याप्त भिन्न हैं। यदि जनता इतनी सावधान मात्र हो कि प्रत्येक मध्यकालीन नगरी और भवन के बारे में सभी वर्णनों का संग्रह करे, तो उसे स्पष्ट ज्ञात हो जाएगा कि उसे किस प्रकार से बुद्धू बनाया गया है और धोखा दिया गया है।

 हम एक तीसरा उदाहरण भी लें । बह इस भवन के बारे में है जिसे इतिहास में अकबर का मकबरा कहकर शैखी बखारी जाती है। यह आगरा के उत्तर में लगभग छः मील की दूरी पर सिकन्दरा में बना हुआ है यह सात-आठ मंजिला हिन्दू राजभवन है, फिर भी इसे विनम्रतापूर्वक, निराचार ही घोषित किया जा रहा है कि इसका निर्माण अकबर के मकबरे के रूप में किया गया था। इतिहास-लेखकों ने जनता से यह तथ्य छुपाकर रखा है कि कहीं भी अकबर ने अथवा उसके किसी भी दरबारी इतिहास-लेखक ने यह दावा किया है कि अकबर ने अपने जीवन-काल में ही अपना मकबरा बनवा लिया था, फिर भी इतिहास-लेखकों का एक वर्ग है जो बिनम्रतापूर्व, निराधार और असंगत स्वर में इस भवन का निर्माण-श्रेय अकबर का देता के और कहता है कि अपनी भावी मृत्यु की सम्भावना-वश ही इसका निर्माण अकबर ने करा लिया था। इतिहासकारों का एक अन्य वर्ग है जो जहाँगीरनामा के धूर्त, अपूर्ण और अस्पष्ट कथनों में विश्वास करके यह मत प्रकट करता है कि इस भवन का निर्माण अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने करवाया था । इतिहास-लेखकों का एक अन्य वर्ग भी है जो राजनीतिज्ञों की भाँति, समझौते की बात करता हुआ अपना मत प्रकट करता है कि इस भवन का कुछ भाग अकबर ने बनवाया था और शेष भाग जहाँगीर ने। इन तीनों मतों में प्रकट किए गये विचारों के लिए वास्तव में लेशमात्र भी आधार नहीं है। तथ्य तो यह है कि यदि गुढ़ार्थ समझा जाय तो इस बात का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि (यदि अकबर सचमुच ही उस भवन में दफ़नाया पड़ा है तो) वह उस पूर्वकालिक हिन्दू राजभवन में गड़ा हुआ है जिसमें वह अपनी मृत्यु के समय निवास कर रहा था। भारतीय इतिहास में झूठ का जितना विशाल अम्बार ठुँस दिया गया है और भोले-भाले विद्यार्थियों को आज भी जिसे सत्-साहित्य कहकर  विश्व-भर में रटाया जाता है, उसे हटाने के लिए कठोर प्रथल्न करने होंगे। विश्व को इस प्रकार भयंकर रूप में धोखा देने के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप में इसके उत्तरदायी ये तथाकथित इतिहास-लेखक ही हैं जिनको सामान्य जनता अपनी आँखों पर बैठाती रही है और अपने प्रिय इतिहास-लेखकों’ के रूप में विश्वास उनमें प्रकट करती रही है। इनमें से कुछ तो जान-बूझकर, बहुत सारे अनजाने में और कुछ अन्य लोग मात्र कायरता-वश ही इन घोर असत्यों, विकराल झूठों को प्रसारित-प्रचारित करने में सहायक रहे हैं । अब समय आ गया है कि भारतीय जनता अपना भी मत प्रकट करे और इस चलते आ रहे धोखे को रोकने के लिए जोर से आवाज़ उठाए। अब उपयुक्त समय है कि वे इन तथाकथित इतिहास-लेखकों से जवाब माँगें कि उन्होंने ये भुल-चूक अथवा इतिहास में विकृतियाँ क्यों होने दी हैं, अथवा क्यों जान-बूझकर उनको बिगाड़ा है ? यदि हमारे इतिहास-लेखकों ने विनम्र और आधारहीन कथन प्रस्तुत न किए होते और प्रत्येक मामले में सावधानता पूर्वक, सभी तथ्यों को जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया होता, तो वे दुरभि-सन्धि अथवा उपेक्षा करने के आरोप से ही न बच गये होते, अपितु उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप में इतिहास के उद्देश्य की सहायता भी कर दी होत। अतः, विश्व को यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक भवनों और नगरियों के सम्बन्ध में दुनिया को भयंकर धोखा दिया जा रहा है, इसे पथभ्रष्ट किया गया है, और अब इस विश्व को माँग करनी चाहिये कि उन भवनों और नगरियों में से प्रत्येक के बारे में सभी तथ्य सामने लाये जाएँ और उनके मूलोद्गम और निर्माण के बारे में पूर जांच की जाये।   वे जो झूठ ही फैलाना चाहते हैं, वो भी अपने क्रम में उन्हीं रटी-रटायी झूठ को अन्य लोगों को भी पढ़ाते-सिखाते हैं । विश्व को इस प्रकार भयंकर रूप में धोखा देने के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप में इसके उत्तरदायी ये तथाकथित इतिहास-लेखक ही हैं जिनको सामान्य जनता अपनी आँखों पर बैठाती रही है और अपने प्रिय इतिहास-लेखकों’ के रूप में अमर्यादित, अंधाधुन्ध विश्वास उनमें प्रकट करती रही है। इनमें से कुछ तो जान-बूझकर, बहुत सारे अनजाने में और कुछ अन्य लोग मात्र कायरता-वश ही इन घोर असत्यों, विकराल झूठों को प्रसारित-प्रचारित करने में सहायक रहे हैं । अब समय आ गया है कि भार- तीय जनता अपना भी मत प्रकट करे और इस चलते आ रहे धोखे को रोकने के लिए जोर से आवाज़ करे । अब उपयुक्त समय है कि वे इन तथाकथित इतिहास-लेखकों से जवाब माँगें कि उन्होंने ये भुल-चूक अथवा इतिहास में विकृतियाँ क्यों होने दी हैं, अथवा क्यों जान-बूझकर उनको विगाड़ा है ?

यदि इतिहास-लेखकों ने विनम्र और आधारहीन कथन प्रस्तुत न किए होते और प्रत्येक मामले में सावधानतापूर्वक, सभी तथ्यों को जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया होता, तो वे दुरभि-सन्धि अथवा उपेक्षा करने के आरोप से ही न बच गये होते, अपितु उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप में इतिहास के उद्देश्य की सहायता भी कर दी होती क्योंकि उससे पाठकों की अनेक पीढ़ियाँ गहनतर अन्वेषण-कार्य में प्रवृत्त हुई होतीं । अतः, विश्व को यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक भवनों और नगरियों के सम्बन्ध में इसे भयंकर धोखा दिया जा रहा है, इसे पथभ्रष्ट किया गया है, और अब, इसीलिए, इस विश्व को माँग करनी चाहिये कि उन भवनों और नगरियों में से प्रत्येक के बारे में सभी तथ्य सामने लाये जाएँ और उनके मूलोद्गम और निर्माण के बारे में पूरी-एरी जांच की जाय ।