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भारत के इतिहास लेखकों ने किस प्रकार जनता को धोखा दिया है !

शिक्षा की अन्य किसी भी शाखा में देश की जनता को इतनी अधिक लम्बी अवधि तक लगातार ठगा नहीं गया है जितना भारतीय इतिहास की विद्या में ।

ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करने वाले विद्यार्थियों और पर्यटकों को ईन स्थानो के इतिहास के नाम पर मनगढ़न्त जानकारियां दी जा रही है।उदाहरण के लिए, दिल्ली में कुतुबमीनार के नाम से पुकारे जाने वाले २३८ फुट ऊँचे स्तम्भ का मामला लीजिए । इसके मुलोद्गम के बारे में सभी तथाकथित इतिहास-लेखक और सामान्य जनता समान रूप में अनिश्चित हैं, फिर भी जनता के सम्मुख जो इतिहास प्रस्तुत किए जाते हैं उनमें नितान्त झूठी बातों को सत्य-कथन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ।

कुछ लोगों का कहना है कि इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया गया था, जो दिल्ली पर सन् १२०६ ई० से १२१० ई० तक राज्य करने वाला शासक था।  अन्य लोग कहते हैं कि इसे ऐबक के दामाद और उत्तराधिकारी अल्तमश ने बनवाया था। अन्य विचार यह है कि अलाउद्दीन खिलजी ने इसे अथवा कम-से-कम इसके कुछ भाग को तो अवश्य ही बनवाया था। चौथा मत यह है कि फ़िरोजशाह तुगलक ने इस स्तम्भ को अथवा इसके कुछ भाग को बनवाया होगा। पाँचवां मत यह भी है कि उपर्युक्त चार शासकों में से एक ने अथवा एक से अधिक शासकों ने अकेले अथवा संयुक्त रूप से इस स्तम्भ का निर्माण कराया होगा। सबसे आश्चर्यकारी तथ्य यह है कि कोई भी इतिहास-प्रन्थ निष्ठापूर्वक, सत्यता से समस्त मामला स्पष्ट नहीं करेगा और  साफ़-साफ़ शब्दों में यह नहीं कहेगा कि कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन अथवा इल्तमश अथवा अलाउद्दीन अथवा फ़िरोजशाह अथवा इनमें से दो अथवा अधिक ने बनवाया था क्योंकि ऊपर जिन चारों मुस्लिम बादशाहों के नाम इस मीनार के निर्माण-श्रेय दिया है, उनमें  से किसी ने भी लिखित दावा नहीं किया है।,

प्रत्येक इतिहास में सरलतापूर्वक यही कहा जाएगा कि कुतुबमीनारको कुतुबुद्दीन अथवा इल्तमश अथवा अलाउद्दीन या फ़िरोज़शाह अथवा इनमें से दो अथवा अधिक ने बनवाया था। तथाकथित सभी इतिहास-लेखक जानते हैं कि उन के कथन झूठे और निराधार हैं, क्योंकि उनमें से किसी भी बादशाह ने स्वयं यह दावा नहीं किया है कि उसने यह स्तम्भ बनवाया था।

इस प्रकार के मामले में सभी इतिहास-लेखक का यह कर्तव्य है कि वह जनता को सभी पाँचों विचार बता दे और साथ में यह भी कह दे कि इन विचारों के लिए कोई भी प्रमाण, उपलब्ध नहीं है। फिर भी, ऐसे तथाकथित इतिहास-लेखकों में से किसी एक ने भी ऐसा काम नहीं किया है। इतिहास-लेखकों को स्पष्टतः इस कुतुबमीनारी-कथा में विद्यमान विसंगतियों का ज्ञान है क्योंकि अखिल भारतीय इतिहास संगठन के वार्षिक समारोह  मे सब असंगतियो से सम्बन्धित शोध-पत्र पढ़ चुके हैं।

जब इतिहास-लेखकों को इस बात की जानकारी है कि कुतुबमीनार का मूलोद्गम विवाद का विषय है, और उपर्यक्त पाँच मतों में से एक के लिए भी कोई ठोस आधार विद्यमान नहीं है, तब क्या उनका कर्तव्य नहीं है कि वे किसी भी निर्णायक मत की घोषणा करने से संकोच करें ? क्या यह भी उनका कर्तव्य नहीं है कि वे सभी तथ्य जनता के समक्ष प्रस्तुत कर दें, और फिर वे यदि स्वयं भी इच्छुक हों, तो किसी भी विशेष मत के बारे में अपनी रुचि का उल्लेख भी कर दें। किन्तु वे जब इतने महत्वपूर्ण तथ्यों को जनता से छुपाते हैं, जब इतनी आवश्यक जानकारी को जनता के सम्मुख प्रकट नहीं होने देते, तब क्या अपने पावन कर्तव्यपालन की अवहेलना करने के लिए ऐसे तथाकथित इतिहास लेखकों को सार्वजनिक रूप में दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिये ? जबकि जनता इतिहास-लेखकों को उनके भारी-भारी वेतन देती  है, उनकी पुस्तकों के मूल्य चुकाती है,, तब क्या जनता को यह आशा नहीं करनी चाहिये कि ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारी उनसे छुपाकर नहीं रखी जाएगी?

इस बात पर यह विचार किया जा सकता है कि सभी विकल्पों का उल्लेख करना असम्भाव्य होगा क्योंकि उससे प्रत्येक विषय बहुत लम्बा हो जाएगा। यह सत्यता नहीं है। मैं ऊपर प्रदर्शित कर चुका हूँ कि किस भी प्रकार उपर्युक्त सभी पाँचों मतों को दो या तीन छोटे वाक्यों में, सम्पूक्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।

 जनता के सम्मुख सभी तथ्यों का रखा जाना अत्यधिक महत्त्व की बात है। कल्पना करें कि किसी व्यक्ति ने सातवीं कक्षा  तक पढ़ने के बाद शैक्षिक अध्ययन समाप्त कर दिया है। उसकी  पुस्तक में कुतुबमीनार पर एक पाठ भी था । यदि उस पाठ के लेखक ने व्याजोक्तिपूर्ण स्वर में कह दिया है कि यह स्तम्भ कुतुबुद्दीन द्वारा ही बनाया गया था, तो वह विद्यार्थी अपने मन में आजीवन यही छाप बनाए रहेगा कि कुतुबुद्दीन ही उस मीनार का निर्माता था। वह यह भी नहीं जानेगा कि उसके विचार के लिए कोई भी आधार नहीं था। बाद में, यदि मेरे जैसा कोई अन्वेषक उस विचार पर विवाद करे, तो वह व्यक्ति इसे अव्यवहार्य मान कर अवहेलना कर देगा और ऐसा करते हुए वह यह भी तकलीफ़ नहीं करेगा कि मैं अपने विचार के समर्थन में जो तर्क और साक्ष्य दे रहा हूँ, उन्हें तो कम-से-कम एक बार पढ़ लिया जाय । इस प्रकार के आधारहीन कथनों से दूसरा भयंकर खतरा यह है कि यह उन गुंजायशों को समाप्त कर देता है जो अन्वेषण के लिए मुक्त होनी चाहिये थी। इस प्रकार, उदाहरण के लिए, यदि सातवीं कक्षा से स्नातकोत्तर स्तर तक कुतुबमीनार के सम्बन्ध में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी बारम्बार उन पाँचों मतों को इस पद-टीप के साथ पढ़ते हैं कि वे पाँचों मत केवल अनुमान ही हैं, तो अनेक जिज्ञासु व्यक्ति कुतुबमीनार वास्तविक मूलोद्गम का पता लगाने के लिए तत्पर हो जाएँगे। अनेक लोग इसके इतिहास को संग्रह करने में अथवा अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में लाने में सफल हो सकेंगे । किन्तु कुतुबमीनार के सम्बन्ध में सभी ऐतिहासिक पुस्तकों में आधारहीन कथन इतिहास के बारे मे अन्वेषण करने से प्रतिभावान अन्वेषकों को रोकते हैं । उन सब को यह समझा दिया जाता है कि कुतुबमीनार का मूल तो असंदिग्ध रूप में सिद्ध किया जा चुका है, और अब उसमें किसी भी प्रकार का शोधकार्य आवश्यक नहीं है। यह घोर शैक्षिक क्षति है जिसका उत्तर इतिहास-लेखकों से अवश्य ही लेना चाहिये।

किन्तु यही सब कुछ नहीं है ।  कुतुबमीनार के बारे में जो कहा गया है, वह तो एक उदाहरण मात्र है। यही बात उन सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक नगरियों, मस्जिदों, मकबरों, किलों, अन्य आवसीय भवनों, पूलों, नहरों और तालाबों के बारे में भी लागू होती है जिनका निर्माण-श्रेय मूस्लिम शासकों को दिया जाता है।

ताजमहल का ही उदाहरण लें। इसके निर्माण की लागत ४० लाख से  करोड़ रुपये तक और इसकी निर्माणावधि १० वर्ष से २२ वर्ष के बीच आंकी जाती है। ईसा अफन्दी से अहमद महन्दीस, आस्टिन द-बरोरड्योक्स, जीरोनीमो वीरोनिओ अथवा बुरी तरह अश्रु बहाते हुए स्वयं शाहजहाँ में से कोई भी व्यक्ति इसका रूप रेखांकर हो सकता है। इस प्रकार की घोर अनिश्चितता ताजमहल के प्रत्येक विवरण की विशिष्टता है, जिसमें मुमताज़ की मृत्यु और उसको दफ़नाने की तारीखें भी सम्मिलित हैं ।

और फिर भी जैसा कुतुब मीनार के मामले में है, वैसा ही ताजमहल के बारे में भी इतिहास ने व्यावहारिक रूप से सभी तथ्य देते हुए यह एक पद-टीप जोड़ दिया है कि सभी समान रूप में निराधार और काल्पनिक हैं। भारत सरकार के पर्यटन और पुरातस्व विभागों के प्रकाशकों सहित सभी इतिहास-पुस्तकें एक ही विनम्र और निराधार मत प्रस्तुत करती हैं तथा यह घोषित करती हैं कि ताजमहल के सम्बन्ध में वही अन्तिम शब्द है । इसका दुष्परिणाम इतना भयावह है कि प्रत्येक व्यक्ति इसी धारणा को हृदर्यगम किये रहता है कि ताजमहल के बारे में कोई भी अनिश्चितता नहीं है।

यथार्थ रूप में तो यही बात भारत के प्रत्येक मध्यकालीन ऐतिहासिक मकबरे, मस्जिद, किले और नगरी के बारे में घटित हो रही है। उनके मूल के सम्बन्ध में अनाप-शनाप कहानियों कहकर जनता को बुद्धू बनाया जा रहा है । मज़ा यह है कि ये सभी कहानियाँ एक-दूसरे से पर्याप्त भिन्न हैं। यदि जनता इतनी सावधान मात्र हो कि प्रत्येक मध्यकालीन नगरी और भवन के बारे में सभी वर्णनों का संग्रह करे, तो उसे स्पष्ट ज्ञात हो जाएगा कि उसे किस प्रकार से बुद्धू बनाया गया है और धोखा दिया गया है।

 हम एक तीसरा उदाहरण भी लें । बह इस भवन के बारे में है जिसे इतिहास में अकबर का मकबरा कहकर शैखी बखारी जाती है। यह आगरा के उत्तर में लगभग छः मील की दूरी पर सिकन्दरा में बना हुआ है यह सात-आठ मंजिला हिन्दू राजभवन है, फिर भी इसे विनम्रतापूर्वक, निराचार ही घोषित किया जा रहा है कि इसका निर्माण अकबर के मकबरे के रूप में किया गया था। इतिहास-लेखकों ने जनता से यह तथ्य छुपाकर रखा है कि कहीं भी अकबर ने अथवा उसके किसी भी दरबारी इतिहास-लेखक ने यह दावा किया है कि अकबर ने अपने जीवन-काल में ही अपना मकबरा बनवा लिया था, फिर भी इतिहास-लेखकों का एक वर्ग है जो बिनम्रतापूर्व, निराधार और असंगत स्वर में इस भवन का निर्माण-श्रेय अकबर का देता के और कहता है कि अपनी भावी मृत्यु की सम्भावना-वश ही इसका निर्माण अकबर ने करा लिया था। इतिहासकारों का एक अन्य वर्ग है जो जहाँगीरनामा के धूर्त, अपूर्ण और अस्पष्ट कथनों में विश्वास करके यह मत प्रकट करता है कि इस भवन का निर्माण अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने करवाया था । इतिहास-लेखकों का एक अन्य वर्ग भी है जो राजनीतिज्ञों की भाँति, समझौते की बात करता हुआ अपना मत प्रकट करता है कि इस भवन का कुछ भाग अकबर ने बनवाया था और शेष भाग जहाँगीर ने। इन तीनों मतों में प्रकट किए गये विचारों के लिए वास्तव में लेशमात्र भी आधार नहीं है। तथ्य तो यह है कि यदि गुढ़ार्थ समझा जाय तो इस बात का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि (यदि अकबर सचमुच ही उस भवन में दफ़नाया पड़ा है तो) वह उस पूर्वकालिक हिन्दू राजभवन में गड़ा हुआ है जिसमें वह अपनी मृत्यु के समय निवास कर रहा था। भारतीय इतिहास में झूठ का जितना विशाल अम्बार ठुँस दिया गया है और भोले-भाले विद्यार्थियों को आज भी जिसे सत्-साहित्य कहकर  विश्व-भर में रटाया जाता है, उसे हटाने के लिए कठोर प्रथल्न करने होंगे। विश्व को इस प्रकार भयंकर रूप में धोखा देने के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप में इसके उत्तरदायी ये तथाकथित इतिहास-लेखक ही हैं जिनको सामान्य जनता अपनी आँखों पर बैठाती रही है और अपने प्रिय इतिहास-लेखकों’ के रूप में विश्वास उनमें प्रकट करती रही है। इनमें से कुछ तो जान-बूझकर, बहुत सारे अनजाने में और कुछ अन्य लोग मात्र कायरता-वश ही इन घोर असत्यों, विकराल झूठों को प्रसारित-प्रचारित करने में सहायक रहे हैं । अब समय आ गया है कि भारतीय जनता अपना भी मत प्रकट करे और इस चलते आ रहे धोखे को रोकने के लिए जोर से आवाज़ उठाए। अब उपयुक्त समय है कि वे इन तथाकथित इतिहास-लेखकों से जवाब माँगें कि उन्होंने ये भुल-चूक अथवा इतिहास में विकृतियाँ क्यों होने दी हैं, अथवा क्यों जान-बूझकर उनको बिगाड़ा है ? यदि हमारे इतिहास-लेखकों ने विनम्र और आधारहीन कथन प्रस्तुत न किए होते और प्रत्येक मामले में सावधानता पूर्वक, सभी तथ्यों को जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया होता, तो वे दुरभि-सन्धि अथवा उपेक्षा करने के आरोप से ही न बच गये होते, अपितु उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप में इतिहास के उद्देश्य की सहायता भी कर दी होत। अतः, विश्व को यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक भवनों और नगरियों के सम्बन्ध में दुनिया को भयंकर धोखा दिया जा रहा है, इसे पथभ्रष्ट किया गया है, और अब इस विश्व को माँग करनी चाहिये कि उन भवनों और नगरियों में से प्रत्येक के बारे में सभी तथ्य सामने लाये जाएँ और उनके मूलोद्गम और निर्माण के बारे में पूर जांच की जाये।   वे जो झूठ ही फैलाना चाहते हैं, वो भी अपने क्रम में उन्हीं रटी-रटायी झूठ को अन्य लोगों को भी पढ़ाते-सिखाते हैं । विश्व को इस प्रकार भयंकर रूप में धोखा देने के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप में इसके उत्तरदायी ये तथाकथित इतिहास-लेखक ही हैं जिनको सामान्य जनता अपनी आँखों पर बैठाती रही है और अपने प्रिय इतिहास-लेखकों’ के रूप में अमर्यादित, अंधाधुन्ध विश्वास उनमें प्रकट करती रही है। इनमें से कुछ तो जान-बूझकर, बहुत सारे अनजाने में और कुछ अन्य लोग मात्र कायरता-वश ही इन घोर असत्यों, विकराल झूठों को प्रसारित-प्रचारित करने में सहायक रहे हैं । अब समय आ गया है कि भार- तीय जनता अपना भी मत प्रकट करे और इस चलते आ रहे धोखे को रोकने के लिए जोर से आवाज़ करे । अब उपयुक्त समय है कि वे इन तथाकथित इतिहास-लेखकों से जवाब माँगें कि उन्होंने ये भुल-चूक अथवा इतिहास में विकृतियाँ क्यों होने दी हैं, अथवा क्यों जान-बूझकर उनको विगाड़ा है ?

यदि इतिहास-लेखकों ने विनम्र और आधारहीन कथन प्रस्तुत न किए होते और प्रत्येक मामले में सावधानतापूर्वक, सभी तथ्यों को जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया होता, तो वे दुरभि-सन्धि अथवा उपेक्षा करने के आरोप से ही न बच गये होते, अपितु उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप में इतिहास के उद्देश्य की सहायता भी कर दी होती क्योंकि उससे पाठकों की अनेक पीढ़ियाँ गहनतर अन्वेषण-कार्य में प्रवृत्त हुई होतीं । अतः, विश्व को यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि सभी मध्यकालीन ऐतिहासिक भवनों और नगरियों के सम्बन्ध में इसे भयंकर धोखा दिया जा रहा है, इसे पथभ्रष्ट किया गया है, और अब, इसीलिए, इस विश्व को माँग करनी चाहिये कि उन भवनों और नगरियों में से प्रत्येक के बारे में सभी तथ्य सामने लाये जाएँ और उनके मूलोद्गम और निर्माण के बारे में पूरी-एरी जांच की जाय ।

पुरातत्त्वीय अभिलेख किस प्रकार बनावटी रूप में प्रस्तुत किये गये हैं।

ताजमहल को शाहजहाँ ने नहीं बनवाया था, फतहपुर सीकरी की स्थापना अकबर ने नहीं की थी, और  ना ही आगरे का लालकिला उसके बनवाया था। कुतुब मीनार कुतुबउद्दीन ने नहीं बनवाया था। इस प्रकार, लगभग प्रत्येक मध्यकालीन ऐतिहासिक भवन, पुल अथवा नहर का झूठा, असत्य निर्माण-श्रेय विदेशी मुस्लिमों को दे दिया गया है, यद्यपि तथ्य यह है कि इनमें से प्रत्येक वस्तु का निर्माण, शताब्दियों पूर्व ही भारत के हिन्दू शासकों द्वारा कर दिया गया था ।

इस प्रकार के असत्य, बनावटी प्रस्तुतीकरण का मूल कारण भारत की १२०० वर्षीय दीर्घकालीन दासता है जिसमें  विदेशी शासकों ने भारतीय पुरातत्व का सर्वनाश कर दिया है, और मनमाना खिलवाड़ किया है ।

It is a False History that Taj Mahal is built by Shah Jahan

भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना होने से पूर्व ‘पुरातत्व विभाग’ नामों निशान भी नहीं था। दीर्घकालीन विदेशी मुस्लिम शासन में हिन्दू-भवनों को बलात्-ग्रहण करने और उन्हीं को मस्जिदों व मकबरों के रूप में दुरुपयोग करने की एक लम्बी अकथनीय कहानी थी। इसलिए, भारत में जब ब्रिटिश सत्ता शासनारूढ़ हुई, तब सभी ऐतिहासिक भवन बहुत पहले ही मकवरों और मस्जिदों में परिवर्तित होकर मुस्लिमों के आधिपत्य और कब्ज़े में थे। जब ब्रिटिश लोगों ने भारत में सर्वप्रथम पुरातलल विभाग की स्थापना की, और सभी स्थानों पर विद्यमान  मुस्लिमों से परामर्श किया और उनकी बतायी हुई मनगढन असत्य बातों को अंकित कर लिया। ऐसी ही झूठी बाते भारत सरकार के सम्मानित पुरातत्व विभाग का मूल भाग बन चकी हैं।

Fatehpur Sikri is not established by Akbar

इन भवनों पर स्वामित्व अथवा कब्ज़ा किए हुए मृस्लिम लोग उन भवनों के मुस्लिम-पूर्व वास्तविक मूलोद्गम अथवा स्वामित्व पर सच्चा प्रकाश डालने में रुचि नहीं रखते थे क्योंकि उनको आशंका थी कि वदि उन्होंने किसी भी भवन के  हिन्दू-मूलोद्गम स्वीकार कर लिया या उसकी चर्चा कर ली, तो उनका उस भवन पर से अधिकार-स्वामित्व या कब्ज़ा छीन लिया जाएगा।

 किसी भवन के बारे में बार-बार यह कहने से, कि वह किसी का मकबरा अथवा मस्जिद है, स्वतः यह प्रपंच प्रचलित हो गया हो गया कि इस भवन का मूल-निर्माण ही उसी प्रयोजन से हुआ है। ब्रिटिश पुरातत्त्वीय विभाग के कर्मचारियों को अनुभव करना चाहिए था कि हिन्दुओं से छीन लेने के बाद उन भवनों को मकबरों और मस्जिदों के रूप में उपयोग में लाया गया था। उदाहरण के लिए, आज जिन भवनों को अकबर के. अथवा सफदरजंग के, अथवा हुमायू के मकबरे के रूप में देखता है, उनका भाव-द्योतन मात्र इतना ही हो सकता है कि (यदि सचमुच ही वहां कुछ है तो) वहाँ पर वे विशिष्ट व्यक्ति दफ़नाए गए है। किन्तु यह कल्पना करना कि वे राजभवनों के सदृश विशाल, भव्य भवन उनके दफनाने के स्थानों और स्मारकों के रूप में बनाए गये थे, घोर ऐैतिहासिक और पुरातस्वीय भूल है । वे भवन तो वहुत पहले से विद्यमान थे। विदेशी मुस्लिम विजित भवनों में निवास करते रहे और शायद वहीं दफ़ना दिये गये। उन विशाल, भव्य भवनों में इनका दफनाया जाना भी सन्दिग्ध ही है। यह भी हो सकता है कि उन भव्य भवनों के भीतर बनी हुई अधिकांश कब्रें झूठी और जाली हैं।

Qutab Minar has not been made by any Muslim Invader. It exits before Islam was born.

 ब्रिटिश सरकार ने जब भारत में पुरातत्त्व विभाग की स्थापना करनी शुरू कर दी, तब उन्होंने देखा कि ऐतिहासिक भवनों में से अधिकांश भवन मुस्लिम आधिपत्य और कब्जे में थे। अपने जाते हुए  साम्राज्य की विरही स्मृतियों को सँजोए हुए उन मुस्लिमों को इसी बात से पर्याप्त सन्तोष था कि कम-से-कम सभी भवनों को पूर्वकालिक मुस्लिम शासकों द्वारा बनाया हुआ ही घोषित कर दिया जाये। ब्रिटिस शाशन ने 1860 मे  Archaeological सर्वे आफ इंडिया की स्थापना की और उन्होने मुसलमानो के नाम कर दिये सारी इमारते।

 कुछ उदाहरण के लिए जानिए की अमरकोट किले के पास, सिन्ध प्रान्त में जिस स्थान पर पुरातत्त्वीय सूचना-पट यह बताते हुए लगा है कि यहाँ पर अकबर का जन्म हुआ था, वह स्थान सही नहीं है।

इसी प्रकार पंजाब में कलानौर नामक स्थान पर कुछ हिन्दू भवान हैं, जहां पर पुरातत्व विभाग की ओर से शिनाख्त के बाद यह सूचना-पट लगाया गया है कि यह वह स्थान है जहाँ पर १३वर्षीय किशोर अकुबर को बादशाह घोषित किया गया था। यही वह स्थान है जहा अकबर को उसके पिता बादशाह हुमायूँ की मृत्यु का समाचार उस समय सुनाया गया था जब १३वर्षीय अकबर वहाँ पड़ाव डाले पड़ा हुए था।

अकबर, जो उस समय बालक हैी था, उस स्थान पर किस प्रकार एक विशाल भवन निर्माण करा सकता था? उसका पितां भी बहाँ कोई भवन नहीं बनवा सकता था क्योंकि एक अन्य घमण्डी मुस्लिम सरदार द्वारा देश से बाहर खदेड़ दिये जाने के कारण, देश से बाहर १५ वर्ष तक रहने के बाद वह भारत में लौटा था । इसलिए यदि निर्दिस्त स्थान पर ही अकबर की ताजपोसी हुई थी, तो उसका अर्थ यह है कि वह उस समय एक पूर्वकालिक हिन्दू भवन में वह पड़ाव डाले हुए था जो पूरी तरह अथवा आंशिक रूप में बारम्बार होने वाले मुस्लिम आक्रमणों से नष्ट हो गया था।

इसी तरह मोहम्मद गवन एक घुमक्कड़ और खोजी व्यक्ति था जो बे-मतलब घूमता हुआ चौदहवीं शताब्दी में पश्चिमी एशिया के मृस्लिम देशों से भारत में आ पहुचा था । वह एक बहमनी सुलतान का वज़ीर हो गया किन्तु एक बहुत थोड़ी अनिश्चित अवधि मात्र के लिए ही। उमका पतन भी समान रूप में हड़बड़ी में हुआ । उसकी हत्या भी उसी सुलतान के आदेशानुसार की गयी जिसका मोहम्मद गवन वजीर था। सामान्यतः जो व्यक्ति शासक या सुलतान की नजरों से गिर जाता था, उसको नियमित रूप से दफ़नाया भी नहीं जाता था। ऐसे  व्यक्ति के शरीर के ट्कड़े-टुकड़े कर दिये जाते थे और बोटियों को चीलों और कृत्तों के खाने के लिए फैंक दिया जाता था। मोहम्मद गवन का अन्त इससे कुछ अच्छा नहीं हो सकता था। यह बात इस तथ्य से भी स्पष्ट थी कि सन् १६४५ ई० तक उसकी कब्र पहचानी नहीं जा सकी थी। फिर, अचानक कोई मूस्लिम उग्रवादी पुरातत्त्वीय कर्मचारी  बीदर गया और वहाँ सड़क के किनारे बनी हुई असंख्य, नगण्य, अनाम कब्रों में से एक को मोहम्मद गवन की कब्र घोषित कर आया। उस समय से ही सभी प्रकार के अन्वेषक जबर्दस्ती उस कब्र को मोहम्मद गवन की कब्र के रूप में उल्लेख करने लगे क्योंकि अब उसपर सरकारी छाप और मान्यता उपलब्ध हो गयी थी।

कुछ दसको पूर्व एक पूरातत्त्व कर्म चारी के मन में यह विचार आया कि अबुल फ़ज़ल की कब्र को खोजा जाय। अबुल फ़ज़ल तीसरी पीढ़ी के मुग़ल बादशाह अकबर का दरबारी और तथाकथित स्वघोषित तिथिवृत्त लेखक था। इतिहास में उल्लेख है कि सन् १६०२ ई० के अगस्त मास की १२तारीख को नरवर से १०-१२ मील की दूरी पर सराय बरार नामक एक स्थान के आस-पास अवूल फ़ज़ल को धात लगाकर मार डाला गया था उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये थे । इस प्रकार की निरर्थक, अनिश्चित और सुनी-सुनायी बातों से प्रारम्भ करते हुए बह कर्मचारी निर्दिष्ट स्थान पर जा पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि एक बड़े क्षेत्र में बहुत सारी कब्रें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। अफ़सरशाही के अनुसार धारणा बनाते हुए उसने लगभग बीसियों कब्रों में से कुछ कब्रों का एक समूह चुन लिया और यह विचार कर लिया कि उनमें से एक तो अबुल फ़ज़ल की कब्र होगी तथा शेष उसके उन परिचरों की होंगी जो उसके साथ ही उस घात में मारे गये होंगे। अगला प्रश्न यह था कि उन चार या पाँच कब्रों में से अबुल फ़ज़ल की कब्र को किस प्रकार पहचाना जाए । इन चार या पाँच कब्रों में से एक कब्र अन्य कब्रों से कुछ इंच अधिक लम्बी थी वही उसकी होगी। पुरातत्व कर्मचारी के लिए वह पर्याप्त और बहुत बड़ी बात थी । महान अकबर के सम्मानित दरबारी को दफ़नाने के पवित्र स्थान के रूप में इसे तुरन्त पहचान लिया गया था । पुरातत्त्वीय पंजिकाओं में भी इस तथ्य को इसी प्रकार अंकित कर दिया गया । इसके इर्द-गिर्द कमरा बनाने के लिए और कदाचित् एक स्थायी रूप में देखभाल करने वाले का वेतन भुगतान करने के लिए कुछ धन-राशि मंजूर कर दी गयी थी । उस समय से इतिहास और पुरातत्त्व के असावधान विद्यार्थी-गण विवश हो गये थे कि वे उस स्थान को अबुल फ़ज़ल की हत्या के रूप में स्थल को शैक्षिक मान्यता दें |।

जब अकबर ने स्वयं ही अबुल फ़ज़ल की कब्र की कोई परवाह नहीं की अथवा उसकी कब्र की पहचान में वह असमर्थ रहा, तो ४५० वर्षों के बाद, बिना किसी विशिष्ट आधारभूत सामग्री के नगण्य क्षेत्र में बिखरी पड़ी सैकड़ों कब्रों में से अबुल फ़ज़ल की कब्र को इस प्रकार पहचान सकने की कोई आशा कोई पुरातत्व-कर्म चारी कर सकता था ?

ये उदाहरण इस बात के लिए पर्याप्त होने चाहिए कि पुरातत्त्व और इतिहास के कर्मचारी और विद्यार्थी-गण ऐतिहासिक (मध्यकालीन) स्थलों के सम्बन्ध में पुरातत्त्वीय पहचान की ओर अधिक विशेष ध्यान न दें, उन पर अत्यधिक विश्वास न करें । विभिन्न अन्तः-प्रेरणाओं, मनोभावों के कारण झूठी-सच्ची बातें लिखी गयी हैं । सभी पुरातत्त्वीय अभिलेखों को, अत्यन्ता सावधानीपूर्वक संशोधित करने, पुनः देखुने-भालने और संकलिंत करने की आवश्यकता है।

हम विश्व गुरु थे और विश्वास रखे कि फिर से बनेंगे।

आज मैं आपसे ऐसे तथ्यों के बारे में चर्चा करना चाहता हूं जिसकी विश्व को छोड़िए भारत के लोगों को ही जानकारी नहीं है। इन तथ्यों को प्रमाणिक तरीके से इकठ्ठा करने के लिए मैंने 30 वर्षो मे 200 से अधिक पुस्तकों का अध्ययन किया जिनमें 2-3 सौ वर्ष पुरानी कई पुस्तकें है , 60 देशों में भ्रमण कर ऐतिहासिक स्थलों का जमीनी अध्ययन किया और इतिहासकारों और रिसर्चर के साथ मुलाकात की और वार्तालाप किया.

5000 वर्षो के लगातार इतिहास मे 4800 वर्षो तक भारत विश्व का सबसे धनी, संपन्न और उन्नत राष्ट्र था।  हमारे पूर्वजो के पास हर प्रकार का ज्ञान और विज्ञान था। उन्हें पूरे ब्रम्हांड का, आकाश, सौर मंडल, पृथ्वी का, भूगोल का, प्रकृति और वानस्पति का पूरा ज्ञान था। उन्हें आध्यात्मिकता का भी संपूर्ण ज्ञान था जिसमें जीवन का उद्देश्य, जन्म, मृत्य, पुनर्जन्म, आत्मा, परमात्मा, मृत्यु के पश्चात आदि जानकारियां थी।
इतनी संपन्नता थी कि हर काल में विदेशी आक्रांताओ की दृष्टि भारत को लूटने की रहती थी। आज से 2700 वर्ष पूर्व से ही माना जाता है है कि बेबीलोन की महारानी समीरामि ने 3 लाख सैनिकों को लेकर भारत मे आक्रमण किया था, ग्रीस से अलेक्जेंडर 2300 वर्ष पूर्व और फिर उसके सेनापति सेल्युकस ने भी आक्रमण किया। मंगोल सम्राट चंगेज़ खान और फिर पिछले 1200 वर्षो से अफ़ग़ान और मुगल का आक्रमण और शाशन, फिर पिछले 500 वर्षो से यूरोपियन आक्रान्ताओ का दौर शुरू हुआ, जिसमें पुर्तगाली, डच , फ्रेंच , डेनिस और ब्रिटिशर है।

Dinesh Rawat


आप कल्पना कर सकते हैं कि कितना अथाह धन और सम्पदा रही होगी कि हज़ारों मिलों से ये लोग कितना रिसोर्स लगा कर भारत मे आए तो कितना लुटा होगा। इतना सब होने के बाद भी भारत आज से करीब सवा दो सौ वर्ष पहले तक विश्व का सबसे महत्वपूर्ण देश था, 93% जनसंख्या शिक्षित थी।
यही नहीं भारत ही सारे विश्व को शिक्षा देता था, यहा तक्षशिला विश्व विद्यालय 2700 वर्षो पहले 10000 विद्यार्थियों को शिक्षित करता था, उस समय संसार मे किसी भी धर्म का जन्म नहीं हुआ था।
भारत के इस महान अतीत के बारे में विश्व के लोगों को  जानकारी क्यू नहीं है, विश्व को छोड़ भी दे तो यहा भारतवासियों को भी इसकी जानकारी  क्यू नहीं है।
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है कि कैसे भारत के इस गौरवशाली इतिहास को छिपाया गया है। आज जरूरत है कि हर भारतीय को अपनी विरासत का पता होना चाहिए। मैं आपसे आने वाले वीडियो मे आपको पूरी जानकारी दूँगा की भारत का सत्य इतिहास क्या है, किस तरह के षडयंत्रों द्वारा इसे धूमिल कर दिया गया, किस तरह भारतवासीओ को ही इसके विरुद्ध खड़ा कर दिया गया है। आज ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि भारत एक बहुत ही गरीब देश रहा और अमेरिका, जापान, पश्चिम के, यूरोपियन देश बहुत उन्नत है और वहां से शिक्षा पाने के लिए आज भी हज़ारों विद्यार्थि गौरवांवित महसूस करते हैं। अंग्रेजी ना जानने वालों को हम प्रायः अशिक्षित ही मानते हैं। आज यह अत्यंत आवश्यक है कि भारत का हर नागरिक अपने महान अतीत के बारे में जाने और गर्वित महसूस करे। उसमे विश्वास जागे की हम विश्व गुरु थे और फिर से विश्व हम ही सर्वश्रेष्ठ बनेंगे.

क्या भारत का इतिहास भारत (भारतीयता) के शत्रुओं ने लिखा है?

इसी प्रश्न का एक पहलु यह है-विश्वभर के विश्वविद्यालय जहाँ बड़े-बड़े इतिहासकार अधिकार जमाकर बैठे हैं, सहस्रों इतिहासकार वहाँ बैठे लाखों लोगों को इतिहास पढ़ाते हैं, क्या वे भारत के शत्रु हैं ? अथवा क्या वे बुद्धि के कोहलू हैं?

अंग्रेजी भाषा में एक पद है जिसका अर्थ है, या तो धूर्त हैं अथवा मूर्ख हैं?

मूर्ख इस दृष्टि से हैं कि प्रायः पढ़े-लिखे लोग एक कल्पना कर लेते हैं और अपनी कल्पना ठीक है, फिर उसके प्रमाण ढूँढ़ते फिरते हैं। जो भी प्रमाण ( ?) उन्हें मिलते हैं उनको जबरदस्ती अपनी कल्पना में सही उतारने की चेष्टा करते हैं। जैसे गोलाकार छिद्र में चौकोर टुकड़ा फिट करने का प्रयास किया जाता है।

True History of India

विद्वानों की कल्पना में यह बात आई कि मध्य एशिया से सभ्यता सारे विश्व में फैली। भारत में भी तथा योरुप में भी। अब लाख युक्ति उनको दें कि यह सभ्यता मूल में भारत से मध्य एशिया को गई और वहाँ से विश्व में फैली परन्तु ये बुद्धि के कोल्हू जो गोल सुराख बनाकर बैठे हैं, इस बात को मानने को तैयार नहीं कि उनके मस्तिष्क में जो गोल सुराख बना है वह उनकी भूल है।

एक विचित्र बात यह है कि वर्तमान सभ्यता में पले तथाकथित विद्वान क्यों इतना बिदक उठते हैं जब उन्हें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि आदि सभ्यता वैदिक सभ्यता है तथा वेदों में सृष्टि सम्बन्धी तथा आध्यात्मिक ज्ञान भरा पड़ा है। कुछ भी, जो भारत के मूल की बात होगी वे मानने को तैयार नहीं होते ?

और तो और, भारत में पढ़े-लिखे (विद्वान) भी उनके पीछे हाँ जी – हाँ जी करते फिरते हैं। उनको भी भारतीयता से ऐसे ही चिढ़ हो गई है जैसे यूरोप वालों को।

भारत में अंग्रेजी शिक्षा के स्थापक मैकाले ने अपने पिता को एक पत्र में लिखा था कि जो भी व्यक्ति एक बार इस शिक्षा पद्धति से शिक्षित हो जाएगा वह अपनी सभ्यता, संस्कृति, मान्यताओं तथा धर्म पर आस्था नहीं रख सकता।

यह कहा जाता है कि जो जाति अपना इतिहास भूल जाती है, वह जन – समुदाय तो रहता है परन्तु दिशाहीन-सा। भारत की महानता, भारत के आध्यात्म ज्ञान में, भारतीयों के चरित्र-बल में, वेद उपनिषदादि दर्शन शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के कारण है। इसी के के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1000 वर्षों की गुलामी के बाद भी हम एक जीवित जाति हैं। परन्तु हमारे इतिहास को भ्रष्ट कर हमें अपनी परम्पराओं से दूर किया जा रहा है। और इसमें मुख्यतया संलग्न ये इतिहासकार ही हैं। हमारा इतिहास बदला जा रहा है। हमारा साहित्य मिथ्या आधारों पर रचा जा रहा है। परिणाम यह हो रहा है कि समाज में अनाचार, दुराचार, भ्रम, भ्रष्टाचार फैल रहा है और यह बढ़ता ही जा रहा है।

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है सुख और शांति और आज उसके पास यही नहीं है। हर जीवन में दुख, अशांति, भय, संशय, अनिश्चितता भरी हुई हैं।

मैं प्रोजेक्ट www.gloriesofindia.in के माध्यम से के हर भारतीय के मन में स्वाभिमान और सम्मान भरना चाहता हूं

दिनेश रावत

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